vat savitri puja : 18 मई को अमावस्या, 19 मई को होगी वट-सावित्री पूजा ।

vat savitri puja

vat savitri puja : अक्षय सुहाग के लिए वट सावित्री का व्रत 19 मई 2023, यानि शुक्रवार को रखा जाएगा । सनातन धर्म में पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ये व्रत ज्येष्ठ मास  की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। इस बार यानि 2023 में अमावस्या तिथि 18 मई को रात 09:03 बजे शुरू होगी और 19 मई रात 08:32 मिनट तक रहेगी इसलिए पूरे देश में ये पूजा 19 मई को की जाएगी

vat savitri puja : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत का महत्व करवा चौथ के व्रत जितना होता है। इस दिन व्रत रखकर सुहागिनें वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की विधि-विधान से पूजा करती हैं। वट वृक्ष की पूजा लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य देने के साथ ही हर तरह के कलह और संतापों का नाश करने वाली मानी जाती है। कहा जाता है कि इसी दिन सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आई थीं। सावित्री के मृत पति के शरीर को बरगद के पेड़ के नीचे रखा गया था, जहां सावित्री ने कठिन तपस्या कर यमराज को प्रसन्न किया और इसी बरगद के नीचे सत्यवान के प्राण वापस आए थे । तभी से महिलाएं सावित्री के समान अपने पति की दीर्घायु की कामना के लिए इस व्रत को करती हैं। इस बार 19 मई को महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखेंगी ।

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वट-सावित्री पूजा में बरगद के पेड़ की पूजा का महत्व

vat savitri puja : मान्यता है कि जो सुहागन इस दिन वट वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करती हैं उन्हें मां सावित्री और त्रिदेव का आशीर्वाद से अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान मिलता है. हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को पूजनीय माना गया है. बरगद का वृक्ष एक दीर्घजीवी यानी लंबे समय तक जीवित रहने वाला विशाल वृक्ष है. इसलिए इसे अक्षय वृक्ष भी कहते हैं. यक्षों के राजा मणिभद्र से वटवृक्ष उत्पन्न हुआ था. मान्यता है कि ये पेड़ त्रिमूर्ति का प्रतीक है, इसकी छाल में विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है. इसके अलावा पेड़ की शाखाएं, जो नीचे की तरफ लटकी रहती हैं, उनको मां सावित्री कहा जाता है. इसे प्रकृति के सृजन का प्रतीक भी माना जाता है. इसलिए संतान प्राप्ति की कामना के लिए भी इसकी पूजा अचूक मानी गई है

बरगद की ही पूजा क्यों होती है वट-सावित्री में?

पौराणिक कथा के अनुसार देवी सावित्री ने पति की रक्षा के लिए विधि के विधान तक को बदल दिया था. पुराणों के अनुसार पति को संकट से उबारने के लिए सावित्री ने घोर तप और व्रत किया था । माता सावित्री के सतीत्व और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उनके पति सत्यवान के प्राण बरगद के पेड़ के नीचे ही लौटाए थे । इसके बाद देवी सावित्री को 100 पुत्रों की माता होने का सौभाग्य भी मिला. उन्होंने सावित्री को यह वरदान भी दिया था कि जो भी सुहागिन बरगद की पूजा करेगा उसे अखंड सौभाग्यवती रहने के आशीर्वाद मिलेगा।

मिथिलांचल में नवविवाहितों के लिए बहुत खास मानी जाती है ये पूजा

vat savitri puja : यूं तो हर साल सुहागिनें इस व्रत को करती हैं लेकिन मिथिलांचल में नवविवाहितों के लिए ये पूजा काफी खास मानी जाती है। पहली बार ये पूजा करने वाली नवविवाहितों के लिए अलग तरह से तैयारी की जाती है। नए और साफ कपड़े पहनकर, सोलह श्रृंगार किया जाता है । मेहंदी, आलता, सिंदूर, लाह की बनी चूड़ी लहठी आदि पहनकर दुल्हन की तरह तैयार होती हैं। अगर संभव हो तो बरगद के पेड़ के नीचे या घर में ही गमले में बरगद की डाली या पौधे लगाकर भी ये पूजा की जाती है । आम, चना, गुड़, खीरा, आदि का विशेष भोग वट-पत्र पर ही लगाया जाता है…यहां बरगद के पत्ते को आशीर्वाद स्वरूप अपने बालों में लगाकर रखती हैं। बर और कनियां यानि गुड्डा-गुड़िया बनाकर उन्हें भी बरगद के नीचे बिठाया जाता है…इन दोनों का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि पूजा में सबसे पहले सिंदूर कनिया यानि कि गुड़िया को लगाया जाता है जिसके बाद ही सभी महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं । सभी सुहागिनें साथ मिलकर सत्यवान और सावित्री की कथा सुनती हैं। क्योंकि इस पूजा में बरगद को पति स्वरूप माना जाता है इसलिए इसमें बांस के पंखे से महिलाएं पहले बरगद के पेड़ को पंखा झलती हैं…फिर अपने पति को उसी पंखे से हवा करती हैं । नैवेद्य में चढ़ाया गया फल, खासकर आम और चना का प्रसाद खिलाती हैं । वहीं इस पेड़ की डाल से गले लगकर, हमेशा साथ रहने का आशीर्वाद माता सावित्री से लेती हैं और रोली या कलावा (कहीं-कहीं पीला धागा) से बरगद के पेड़ को बांधती हैं जिससे ये माना जाता है कि पति-पत्नी का रिश्ता जन्मजन्मांतर तक अटूट रहेगा । कई जगह तो पूजा के बाद, बिना नमक का खाना जैसे खीर आदि का आहार महिलाएं एक बार ग्रहण करती हैं…और कहीं- कहीं पूरे दिन व्रत करती हैं।

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