सेंगोल (sengol) क्या है ? नए संसद में क्यों सुर्खियों में है ‘सेंगोल’ ?

sengol

देश में फिलहाल नए संसद को लेकर लगातार चर्चा है उसमें एक और नया शब्द जुड़ गया है ‘सेंगोल’ (sengol)। जी हां सही सुन रहे हैं आप ‘सेंगोल’ । देश के ज्यादातर लोग इससे या इस शब्द से भी परिचित नहीं होंगे । लेकिन केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ट्विट ने ‘सेंगोल’ को सुर्खियों में ला दिया है । उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी इसका ज़िक्र करते हुए कहा कि 14 अगस्त 1947 को एक अनोखी घटना हुई थी. इसके 75 साल बाद भी आज देश के अधिकांश नागरिकों को इसकी जानकारी नहीं है. देश की आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत से सत्ता के के हस्तांतरण का प्रतीक बना था  ‘सेंगोल’ । उन्होंने दावा किया है कि आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 को तमिल पुजारियों से विधिवत् तरीके से सेंगोल ग्रहण किया था ।

sengol

इन तस्वीरों में आप ‘सेंगोल’ को देखकर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ये हमारे समृद्ध भारतीय कला, संस्कृति और धर्म का प्रतीक है जिसमें इसके शीर्ष पर भगवान शिव के वाहन नंदी विराजमान हैं । एक तरह से ये किसी राजा के हाथ में सुशोभित होने वाला राजदंड के समान है । ‘सेंगोल’ जिसे सौंपा जाता है उससे न्यायपूर्ण शासन की आशा की जाती है । सूत्रों के अनुसार सेंगोल को हिंदी में राजदंड कहा जाता है और इसका इस्तेमाल चोल साम्राज्य से होता आ रहा है । इस साम्राज्य का जब कोई राजा, अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता था तो उसे सत्ता हस्तांतरण के रूप में सेंगोल देता था. सेंगोल देने की परंपरा चोल साम्राज्य से ही चली आ रही है. कुछ इतिहासकार मौर्य, गुप्त और विजयनगर साम्राज्य में भी सेंगोल को प्रयोग किए जाने की बात कहते हैं।

आखिरी बार 1947 में भारता के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंट बेटन ने जवाहरलाल नेहरू को सेंगोल (sengol) सौंपा था. ये वही सेंगोल है, जो हिंदू परंपरा में सत्ता हस्तांतरण की पहचान रहा है और तमिल संस्कृति की शान रहा है. माना जा रहा है कि ‘सेंगोल’ तमिल शब्द ‘सेम्मई’ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है ‘नीतिपरायणता’ या संस्कृत के शब्द ‘संकु’ से लिया गया होगा जिसे शंख से जोड़ कर देखा जा रहा है । सेंगोल यह बताता है कि सत्ता का चक्र परिवर्तन होता रहता है। वह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रहती है।

क्या हुआ था 14 अगस्त 1947 को ?

sengol

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तत्कालीन वायसराय लार्ड माउनटबेटन ने भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी को इसे सौंप दिया था। लेकिन इसके पीछे एक दिलचस्प किस्सा है । वायसराय लार्ड माउनटबेटन  ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से एक सवाल किया था कि “ब्रिटिश शासन से भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में किसी समारोह का पालन किया जाना चाहिए ?” इस प्रश्न को लेकर नेहरू जी ने स्वतंत्रता सेनानी राजाजी यानि सी. राजगोपालाचारी से परामर्श किया… जिसके बाद राजाजी ने चोल कालीन समारोह का प्रस्ताव दिया जहां एक राजा से दूसरे राजा को सत्ता का हस्तांतरण उच्च पुरोहितों की उपस्थिति में पवित्रता और आशीर्वाद के साथ पूरा किया जाता था। राजाजी ने तमिलनाडु के तंजौर जिले में शैव संप्रदाय के धार्मिक मठ – थिरुववादुथुराई अधीनम से संपर्क किया। थिरुववादुथुराई अधीनम 500 वर्ष से अधिक पुराना है और पूरे तमिलनाडु में 50 शाखा मठों को संचालित करता है। अधीनम के नेता ने तुरंत पांच फीट लंबाई के ‘सेंगोल’ को तैयार करने के लिए चेन्नई में सुनार वुम्मिदी बंगारू चेट्टी को नियुक्त किया।

लेकिन इन दावों में कितनी है सच्चाई ?

sengol

सेंगोल के विषय में किए जा रहे सरकार के दावों में विवाद भी है. क्या वाकई सेंगोल (sengol) को अधिकारिक तौर पर “सत्ता-हस्तांतरण के प्रतीक” के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. या प्रधानमंत्री नेहरू को यह उपहार में दी गई एक सोने की छड़ी भर थी, जिसे नेहरू ने आनंद भवन में रखवा दिया था. क्योंकि यहां तस्वीर में आप लिखा देख सकते हैं ।  उस समय सत्ता के हस्तांतरण के लिए क्या ये तरीका आधिकारिक तौर पर चुना गया था. इसके लिए क्या रीति-रीवाज़ अपनाए गए थे. इस विषय में दस्तावेज़ी सबूत पब्लिक डोमेन में नहीं हैं. मीडिया रिपोर्ट्स और किताबों के आधार पर दावे के पक्ष में सबूत दिए जा रहे हैं. 

वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर की किताब Ambedkar’s Thoughts on Linguistic States, पेरी एंड्रेसन की किताब The Indian Ideology और यास्मीन खान की किताब Great Partition: The Making of India and Pakistan के कुछ हिस्से सबूत के तौर पर दिए गए हैं. इनमें किसी धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए नेहरू की आलोचना की गई है. लेकिन यहां भी यह साफ-साफ नहीं कहा गया है कि नेहरू ने सेंगोल को सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक माना और धार्मिक आयोजन कोई आधिकारिक आयोजन था. 

अब तक कहां था ‘सेंगोन’ (sengol) ?

माना जाता है कि सत्ता हस्तांतरण के बाद इसे इलाहाबाद संग्रहालय में रख दिया गया था । 2018 में जब एक मैगजीन में इसका ज़िक्र मिला तब जाकर इसे इलाहाबाद म्यूज़ियम में पाया गया ।

केन्द्रिय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि नए संसद भवन में इसे स्पीकर के समक्ष रखा जाएगा ।

इसे भी पढ़ें : यूरोपीय देशों में मंदी का दौर। जानिए भारत में कितना असर ?

YOUTUBE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *